
भाई ललित शर्मा जी "सादर हरिस्मरण" आज ललित डाट काम पर आपका आलेख हसदपुर देखा. जानकर अत्यंत हर्षित हूं कि अभनपुर के नज़दीक बाबा साहब का आश्रम है . अत्यंत्य प्रसन्नता हुई. गुरु-कृपा ही है कि स्वामी शुद्धानंद नाथ के सहोदर स्वामी विकासानंदनाथ के आश्रम में आपने जाकर जो वृतांत लिखा उसे बांच कर मैं स्वयम अपने इस ब्लाग पर पुन: आध्यात्मिक आलेखन करने संकल्पित हूं. स्वामी शुद्धानंद नाथ एवम स्वामी विकासानंद जी वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के बेटे हैं. दौनों संत महान ग्यानी एवम उच्च-शिक्षित प्राप्त हैं. दौनों ने ही कठोर तपस्या कर 
आध्यात्मिक तत्व ग्यान प्राप्त किया. तदुपरांत वे लोक कल्याणार्थ निकल पड़े. स्वामी शुद्धानंदनाथ ने "प्रपंच आध्यात्म" योग की बुनियाद रखी. उन्हौने मध्य-वर्गीय परिवारों को सदाचरण में बांधने का संकल्प लिया था . मेरे परिवार से उनका जुड़ाव 1960 में हुआ.तब बाबूजी सालिचौका रोड जिला नरसिंहपुर में सहायक-स्टेशन-मास्टर हुआ करते थे. स्वामी जी ने पाविवारिक शुचिता एवम वैचारिक शुभ्रता का पाठ पढ़ाया. मुझे याद है कि हम बच्चों ने गुरुदेव के पेट पर बैठकर खूब उछलकूद की है. स्वामी जी आज़ के कथित बाबाओं से भिन्न थे. न वे धन-संग्रही पात्र लेकर निकले थे न ही ऐसी कोई लालसा ही रही होगी उनमें. स्वामी जी ने मां सव्यसाची प्रमिला देवी को अन्नपूर्णा कह ही दिया था. कभी भी मातुश्री के किचन में ऐसी स्थिति नहीं देखी हमने कि कोई अतिथि भूखा आए उसे सुस्वादु आहार न मिले. मां को दीक्षित किया तो उनसे मां ने पूछा था-"मेरी साधना ..?"
गुरुदेव बोले-"जो बिल्लोरे बाबू (बाबूजी को इसी नाम से बुलाते थे गुरुदेव) करें वही तुम्हारी साधना है."
मां तीसरी हिंदी तक शिक्षित थीं संस्कृत के श्लोक, शिवमहिम्नस्त्रोत,चर्पटपजारिका, कैसे पढ़तीं बस इसी दु:ख से दुबली हुईं जा रहीं थीं. फ़िर अचानक एक बार मां पंद्रह बीस दिनों तक केवल मौन रहकर श्लोक,
शिवमहिम्नस्त्रोत,चर्पटपजारिका, आदि की अनुगूंज में डूबी रहीं और अचानक सब कुछ धारा प्रवाह सस्वर अदभुत उन्हौने बताया -"बस गुरु कृपा है.."
आज़ गुरुदेव की ही कृपा है जो "मेलोडी आफ़ लाइफ़" पर आलेखन प्रारम्भ हुआ.
आपका आभारी हूं ललित भाई ...
"अलख-निरंजन"




